अँग्रेजों नें हमें कैसे नेपालियों का गुलाम बनाया, आईए संक्षिप्त में पढिए

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चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र सम्राट अशोक नें समृद्ध मगध का निर्माण किया । बादशाह अकबर नें उसी साम्राज्य को और भी विशालतम एवं गौरवशाली बनाया । मुगल आधिपत्य के बाद फिर नबाबी शासनकाल आरभ हुआ औऱ उसी नवाबीकाल के १७ वीं सदी का शुरूवात में ही बेपार करने हेतु अँग्रेज भारत आए । १७वीं सदी के मध्य तक में अँग्रेजों नें लगभग पुरे भारत में(गंगा मैदानी अर्थात मधेश सहित) बेपार पर अपने नियंत्रण बना चुकी थी । बेपार करते करते अँग्रेजी हुकूमत ने भारत में चल रहे अधिकतर रियासतों पर भी अपना पूर्ण नियंत्रण बना लिया । याद रहे, मुगल और नवाबी शासनकाल में मालबाजी/लगान उठाने का काम सहज बनाने हेतु भारत भर सैकड़ों “रियासत” का निर्माण हुआ था । उसी रियासतों के जरिए अँग्रेजी हुकूमत भी लगान उठाते रहे ।

ईधर यशोब्रहम खान के वंशज नरभूपाल शाह सन् १७१६ में और उनके बेटे पीएन शाह सन् १७४३ में गोरखा के राजा बने । उस समय मधेश का १ इंच जमीन भी गोरखा के अधिन में नहीं था । उसके बाद :
* सन् १७५७ में गोरखाद्वारा कीर्तिपुर पर पहला आक्रमण हुआ जिसमें मधेशी राजा जयप्रकाश मल्ल(ठाकुर थर से मल्ल परिवर्तित ) से बूरी तरह पराजित हुए । उसी युद्ध में कालू पांडे मधेशी सैनिक के हाथों मारा गया और पीएन शाहको भी जीवन दान मिला ।
* १७६४ में फिर आक्रमण और दुसरीबार भी पराजय हाथ मिला ।
* अन्तत: १७६८ सेप्टेंबर २५ को छल पूर्वक इन्द्रजात्रा कि मध्यरात में आक्रमण कर कीर्तिपुर पर कब्जा जमाते हुए सन् १७६९ तक में पुरे नेपाल(काठमांडु घाटी) पर कब्जा जमाया ।

मकवानपुर(मधेश), जिस वक्त मुगल नवाब कासिम अलि खानके मातहत ही था, पहलीवार सन १७६२ में वहाँ पर आक्रमण हुआ । पीएन शाह नें १७७४ में बिजयपुर चौदण्डी पर भी आक्रमण किया परंतु उस युद्ध में उनके बहुत सैनिक मारे गए । उसी वर्ष अचानक विजयपुर के राजा कर्ण सेन की मौत हो गई । कर्ण सेन के ५ वर्ष के बेटे को क्रूर पीएन शाह नें एक ब्राहमण के जरिए विष खिलाकर हत्या कर डाला । उसके बाद सन् १७७५ जनवरी ११ के दिन पीएन शाह का भी मृत्यु हो गया और फिर उनके बेटे प्रताप शाह राजा हुए । सन् १८०४ में रणबहादूह शाह नें बुटवल के राजा पृथ्वीपाल सेन को कन्यादान के बहाने काठमांडू बुलाकर छल पूर्वक नजरबंद में ले लिया गया और फिर बाद में भीमसेन थापा नें पृथ्वीपाल सेन सहित डेढ दर्जन अंग रक्षकों को काटकह हत्या कर दिया ।
उसके बाद सन् १८०९ में मधेश से हो रहे युद्ध में रणजीत सिंह से बुरी तरह नेपाल हार गई और बचेहुए नेपाली सेना को कांगडा किले में छिपकर जान बचाना पडा ।

ईतना होने के बाद भी सन् १८१६ तक गोरखालियों ने छिप छिपकर मधेश का जमीन पर कब्जा करते रहते थे और अँग्रेजी फौज आनेपर फिर वहाँ से भाग जाते थे । बारबार यह सिलसिला चलता रहा, गोरखालियों नें मधेश में आतंक एवं लूटपाट मचाता रहा और अपनी ऐसी हर्कतों से दक्षिणी भारत की युद्ध में उलझे अँग्रेजी हुकूमत को परेशान करता रहा । पानी सर से उपर हो रहा था, आतंक और लूटपाट से मधेशी भी आक्रोशित हो रहे थे और इसलिए अँग्रेजी फौज नें सन् १८१४ नवम्बर १ में ब्रेड शॉ के नेतृत्व में लौर्ड हेसिंग्टस नें युद्ध का ऐलान कर ही दिया । गोरखालियों के आतंक से आक्रोशित रहे मधेशी उस युद्ध में अँग्रेजों को ही साथ/पक्ष दे रहे थे । युद्ध चलता रहा और :
* सन् १८१५ अप्रैल २८ में अमर सिंह थापाद्वारा आत्म समर्पन हुआ,
* ७०० सैनिक सहित सेनापति भक्ति सिंह का अँग्रेजी गोली से मौत हो गई,
* आक्टरलोनी को काठमांडु आक्रमण का जिम्मेदारी सौंपा गया,
* सन् १८१५ मई १५ में बम शाह नें आत्मसमर्पन किया और गोरखाली संधि करने पर मजबूर हुआ,
* राजगुरू गजराज मिश्रको लालमोहर सहित संधि के लिए अँग्रेजों के पास भेजा गया,

संधी में अँग्रेजोंद्वारा रखे गए शर्तों को मानकर संधि-पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए गोरखालियों को १५ और १२ दिनों का मोहलत दिया गया । मोहलत बाद कोई रिस्पोंस नहीं आनेपर सन् १८१६ फरवरी में २० हजार सैनिक(मधेशी और यूरोपियन सहित) लेकर युद्ध के लिए रवाना हुए । मकवानपुर गढी में गोरखालियों नें उस सेनाको रोकने का प्रयास किया परंतु सैकडों गोरखाली सैनिक मारे गए और फिर दुबारा रोकने का प्रयास भी नहीं कर सका । जब देशी और अँग्रेजी फौज काठमांडु की ओर बढने लगी तब हडबडाते हुए सुगौली में की गई संधी पर हस्ताक्षर करके चन्द्र शेखर उपाध्याय आक्टरलोनी के पाउ में हाजिर हुए ।

गोरखालियों द्वारा बहुत अनुनय विनय किया गया । उस के बाद और लगान उठाने की सहजता को ध्यान देते हुए ८ दिसंबर१८१६ में फिर अँग्रेजों नें सालाना २ लाख रूपयों में पूर्वी मधेश का जमीन नेपालियों के हाथों भांडे में सौंप दिया । उसी दिन से नेपाल अँग्रेजों का अघोषित दास बन गया । उस सुगौली संधी को आजतक नेपाली लोग “असमान संधी” बताते आ रहें है ।

अँग्रेज के बलपर टिकी नेपाली राणा सरकार तरफदारी करनेपर मजबूर था । सन १८५७-५९ में अँग्रेज विरूद्ध भारतीय सिपाही बिद्रोह शुरू हो गया । उस सैन्य विद्रोह में भारतीय सिपाही को दबाने के लिए तात्कालिक प्रधानमंत्री जंग बहादूर नें सन् १८५७ जूलाई २ में छह रेजिमेंट गोरखाली फौज हिन्दुस्तान भेज दिया । हेवलक के नेतृत्व में रहे अँग्रेजी फौज से मिलकर नेपाली फौज नें भारतीय विद्रोहियों पर भारी दमन किया । विद्रोह और तेज होने के कारण फिर सन् १८५७ दिसंबर १० में ३ पल्टन के साथ जंगबहादुर स्वयं लखनऊ पहुंचे । उसके बाद विद्रोह शांत हुआ । उसी मदत के बदले सन १८६० नवंबर १ में अँग्रेज खुश होकर एक संधि मार्फत पश्चिम मधेश के बाँके से कंचनपुर तक का जमीन उपहार में नेपाल को दे दिया ।

इस तरह मधेश की हमारी यह जमीन हमसे पुछे बगैर दो संधी के तहत सन् १८१६ और सन् १८६० में अँग्रेजोंद्वारा नेपालियों को सौंपा गया और मधेशियों को उपनिवेश में धकेल दी गई । हमारी जमीन हरण का यह ही संक्षिप्त इतिहास है ।